इश्क मे पड़ने की ज़रूरत क्या है
दिल से तेरे मैं खुद ही निकल जाता हूँ
तुझे बताने की ज़रुरत क्या है
मेरे इश्क से कर ली बेरुखी तूने
ये जताने की ज़रुरत क्या है....
~~
हिम्मत नहीं है की अब मैं फिर
साज़िश-ए-इश्क में पड़ जाऊं
सोज़ भर के मोहब्बत का सीने में खुद-ब-खुद
यूँ बे-वजह जल जाने की ज़रुरत क्या है
~~
जब रहा ही नहीं दर्मियां अपने
मोहब्बत का रिश्ता नफरत के सिवा
तो देखकर मेरी आंखो मे तुमको
यूं नज़रें मिलाने की ज़रूरत क्या है
~~
शेष ....
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